महिलाओं का स्वास्थ्य जीवन के हर चरण में अलग-अलग आवश्यकताओं से जुड़ा होता है। किशोरावस्था, विवाह, गर्भावस्था, प्रसव और रजोनिवृत्ति तक हर अवस्था में शरीर में कई बदलाव होते हैं, जिनकी सही देखभाल जरूरी होती है। ऐसे में प्रसूति एवं स्त्री रोग (Obstetrics and Gynecology) विभाग महिलाओं को संपूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है। यह केवल गर्भावस्था और प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य, हार्मोनल समस्याओं और विभिन्न स्त्री रोगों के निदान एवं उपचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रसूति एवं स्त्री रोग चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जो महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य, गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद की देखभाल से संबंधित होती है। इसमें दो अलग-अलग लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हुए क्षेत्र शामिल होते हैं—प्रसूति (Obstetrics) और स्त्री रोग (Gynecology)।
यह विभाग महिलाओं के स्वास्थ्य को समग्र रूप से समझते हुए किशोरावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक आवश्यक चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है। मासिक धर्म की अनियमितता, बांझपन, गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं, संक्रमण, हार्मोनल असंतुलन, गर्भावस्था की निगरानी और सुरक्षित प्रसव जैसी अनेक स्थितियों का उपचार इसी विभाग के अंतर्गत किया जाता है।
हालांकि दोनों विषय महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े हैं, लेकिन इनका कार्यक्षेत्र अलग-अलग होता है।
प्रसूति (Obstetrics) मुख्य रूप से गर्भधारण, गर्भावस्था, भ्रूण के विकास, प्रसव और प्रसव के बाद मां एवं शिशु की देखभाल पर केंद्रित होता है। इसमें गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, अल्ट्रासाउंड, प्रसव की योजना और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का प्रबंधन शामिल होता है।
वहीं स्त्री रोग (Gynecology) महिलाओं के प्रजनन अंगों से संबंधित बीमारियों के निदान और उपचार पर केंद्रित होता है। इसमें मासिक धर्म संबंधी समस्याएं, ओवरी की बीमारी, गर्भाशय की गांठें, पीसीओएस, संक्रमण, एंडोमेट्रियोसिस, रजोनिवृत्ति से जुड़ी समस्याएं और अन्य स्त्री रोगों का इलाज किया जाता है।
आज अधिकांश विशेषज्ञ दोनों क्षेत्रों में प्रशिक्षित होते हैं, इसलिए एक ही डॉक्टर महिलाओं को गर्भावस्था और स्त्री रोग दोनों से संबंधित उपचार प्रदान कर सकते हैं।
स्त्री रोग विशेषज्ञ महिलाओं की कई सामान्य और जटिल स्वास्थ्य समस्याओं का निदान और उपचार करते हैं। यदि किसी महिला को मासिक धर्म अनियमित होना, अत्यधिक रक्तस्राव, पीरियड्स के दौरान असहनीय दर्द, बार-बार संक्रमण, सफेद पानी की समस्या, पेल्विक दर्द या हार्मोनल असंतुलन जैसी परेशानी हो, तो गायनेकोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए।
इसके अलावा पीसीओएस, गर्भाशय की गांठ (फाइब्रॉइड), ओवरी में सिस्ट, एंडोमेट्रियोसिस, बांझपन, रजोनिवृत्ति से जुड़ी समस्याएं, गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) की जांच तथा महिलाओं में होने वाले कुछ कैंसर की शुरुआती पहचान भी स्त्री रोग विशेषज्ञ द्वारा की जाती है।
साइटिका के लक्षण हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते। कुछ लोगों को केवल हल्का दर्द महसूस होता है, जबकि कुछ मरीजों में दर्द काफी गंभीर हो सकता है।
सबसे प्रमुख लक्षण कमर के निचले हिस्से से शुरू होकर कूल्हों और एक पैर में नीचे की ओर फैलने वाला दर्द है। कई मरीज इस दर्द को जलन, बिजली के झटके या चुभन जैसा बताते हैं। लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने पर यह दर्द अधिक बढ़ सकता है।
इसके अलावा पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन, मांसपेशियों में कमजोरी, चलने में कठिनाई और पैर उठाने में परेशानी भी दिखाई दे सकती है। कुछ मामलों में मरीज को ऐसा महसूस होता है कि पैर में ताकत कम हो गई है या पैर अचानक जवाब दे रहा है।
यदि दर्द के साथ पेशाब या मल पर नियंत्रण कम हो जाए या पैरों में तेजी से कमजोरी बढ़ने लगे, तो यह गंभीर स्थिति हो सकती है और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
समय पर जांच और उपचार कराने से कई गंभीर बीमारियों को शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रित किया जा सकता है।
अक्सर महिलाएं केवल गर्भावस्था के दौरान ही डॉक्टर से मिलने की सोचती हैं, जबकि कई अन्य परिस्थितियों में भी विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी होता है।
यदि मासिक धर्म कई महीनों तक अनियमित रहे, अत्यधिक दर्द या रक्तस्राव हो, बार-बार संक्रमण हो, गर्भधारण में कठिनाई आ रही हो, पेल्विक दर्द लगातार बना रहे, रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव हो या गर्भावस्था का संदेह हो, तो तुरंत प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
इसके अलावा विवाह से पहले, गर्भधारण की योजना बनाते समय और 40 वर्ष की आयु के बाद नियमित स्वास्थ्य जांच कराना भी महिलाओं के लिए लाभदायक माना जाता है।
गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक होती है। इन जांचों के माध्यम से डॉक्टर भ्रूण के विकास, रक्तचाप, रक्त की जांच, शुगर लेवल, वजन और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की निगरानी करते हैं।
समय-समय पर किए जाने वाले अल्ट्रासाउंड से शिशु के विकास का सही आकलन किया जाता है। यदि किसी प्रकार की जटिलता, जैसे हाई ब्लड प्रेशर, गर्भकालीन मधुमेह, एनीमिया या भ्रूण के विकास में समस्या दिखाई देती है, तो उसका समय रहते उपचार शुरू किया जा सकता है।
नियमित प्रसवपूर्व जांच सुरक्षित गर्भावस्था और स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
महिलाओं में कई प्रकार की स्त्री रोग संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं। इनमें मासिक धर्म की अनियमितता, पीसीओएस, योनि संक्रमण, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन, एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय की गांठें, ओवरी में सिस्ट, हार्मोनल असंतुलन और बांझपन प्रमुख हैं।
इसके अलावा कई महिलाओं को रजोनिवृत्ति के दौरान हॉट फ्लैश, नींद की समस्या, मूड में बदलाव और हड्डियों की कमजोरी जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है।
इन समस्याओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। समय पर जांच कराने से बीमारी का सही कारण पता चलता है और उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है।
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग महिलाओं के स्वास्थ्य की विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसमें गर्भावस्था की नियमित जांच, प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल, सामान्य एवं सिजेरियन डिलीवरी, परिवार नियोजन परामर्श, बांझपन का मूल्यांकन, अल्ट्रासाउंड, स्त्री रोग संबंधी जांच, लैप्रोस्कोपिक सर्जरी तथा विभिन्न स्त्री रोगों का उपचार शामिल होता है।
इसके अलावा सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग, स्तन स्वास्थ्य संबंधी परामर्श, हार्मोनल विकारों का उपचार, किशोरियों की स्वास्थ्य समस्याओं का प्रबंधन और रजोनिवृत्ति के दौरान आवश्यक चिकित्सा सेवाएं भी इसी विभाग के अंतर्गत दी जाती हैं।
आधुनिक अस्पतालों में अनुभवी विशेषज्ञों, उन्नत तकनीक और व्यक्तिगत देखभाल के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण उपचार प्रदान करने का प्रयास किया जाता है।
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वह स्थिति होती है जिसमें गर्भावस्था के दौरान मां, शिशु या दोनों के स्वास्थ्य पर सामान्य से अधिक जोखिम होता है। ऐसी गर्भावस्था में नियमित निगरानी, समय-समय पर जांच और विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख बेहद जरूरी होती है ताकि किसी भी संभावित जटिलता को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी कई कारणों से हो सकती है। यदि महिला की आयु 35 वर्ष से अधिक या 18 वर्ष से कम हो, पहले गर्भपात या समय से पहले प्रसव का इतिहास रहा हो, जुड़वां या एक से अधिक शिशुओं का गर्भ हो, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थायरॉयड, हृदय रोग या किडनी संबंधी बीमारी हो, तो गर्भावस्था को हाई-रिस्क माना जा सकता है। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव, भ्रूण के विकास में कमी या प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएं भी इस श्रेणी में आती हैं।
हालांकि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का मतलब यह नहीं है कि गर्भावस्था सफल नहीं होगी। यदि महिला समय पर जांच कराती है, डॉक्टर की सलाह का पालन करती है और आवश्यक उपचार लेती है, तो स्वस्थ मां और शिशु की संभावना काफी बढ़ जाती है।
सामान्य प्रसव (Normal Delivery) और सिजेरियन डिलीवरी (Cesarean Section) दोनों ही सुरक्षित प्रसव के तरीके हैं। कौन-सा तरीका अपनाया जाएगा, यह मां और शिशु की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।
सामान्य प्रसव में शिशु का जन्म प्राकृतिक रूप से योनि मार्ग से होता है। इस प्रक्रिया में रिकवरी अपेक्षाकृत जल्दी होती है, अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और संक्रमण का खतरा भी अपेक्षाकृत कम रहता है। यदि गर्भावस्था सामान्य है और किसी प्रकार की जटिलता नहीं है, तो डॉक्टर सामान्य प्रसव को प्राथमिकता देते हैं।
दूसरी ओर, सिजेरियन डिलीवरी एक शल्य प्रक्रिया है, जिसमें पेट और गर्भाशय पर चीरा लगाकर शिशु को बाहर निकाला जाता है। जब सामान्य प्रसव मां या शिशु के लिए सुरक्षित नहीं होता, तब सिजेरियन की सलाह दी जाती है। उदाहरण के लिए, भ्रूण की असामान्य स्थिति, प्रसव में अत्यधिक देरी, प्लेसेंटा की समस्या, भ्रूण में तनाव या अन्य चिकित्सकीय कारणों में यह विकल्प अपनाया जाता है।
दोनों ही प्रसव विधियों के अपने-अपने लाभ और सीमाएं हैं। इसलिए केवल डॉक्टर की सलाह और चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर ही उचित विकल्प का चयन करना चाहिए।
कई स्त्री रोग शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाते। इसलिए केवल समस्या होने पर ही डॉक्टर के पास जाना पर्याप्त नहीं होता। नियमित गायनेकोलॉजिकल चेकअप महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस जांच के माध्यम से गर्भाशय, अंडाशय और गर्भाशय ग्रीवा से संबंधित समस्याओं की शुरुआती पहचान की जा सकती है। आवश्यकता होने पर पैप स्मीयर, पेल्विक जांच, अल्ट्रासाउंड या अन्य परीक्षण किए जाते हैं, जिससे संक्रमण, हार्मोनल असंतुलन, फाइब्रॉइड, पीसीओएस और कुछ प्रकार के कैंसर का समय रहते पता लगाया जा सकता है।
यदि किसी महिला को कोई लक्षण नहीं भी हैं, तब भी नियमित स्वास्थ्य जांच भविष्य में गंभीर समस्याओं के जोखिम को कम करने में मदद करती है। विशेष रूप से 30 वर्ष की आयु के बाद और रजोनिवृत्ति के समय नियमित जांच कराना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि सभी स्त्री रोगों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर कई समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।
संतुलित और पौष्टिक आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, पर्याप्त नींद लेना और तनाव को नियंत्रित रखना महिलाओं के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। मासिक धर्म के दौरान व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना, सुरक्षित यौन संबंध अपनाना और संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना भी आवश्यक है।
गर्भधारण की योजना बनाने से पहले स्वास्थ्य जांच कराना, डॉक्टर द्वारा सुझाए गए टीकाकरण समय पर करवाना, धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से बचना तथा नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराना भी महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में सही अस्पताल और अनुभवी विशेषज्ञ का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। लाइफलाइन हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग महिलाओं को उनकी आयु और स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुसार व्यापक चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने का प्रयास करता है।
यहां अनुभवी प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों की टीम आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की सहायता से गर्भावस्था की नियमित निगरानी, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का प्रबंधन, सामान्य एवं सिजेरियन डिलीवरी, स्त्री रोग संबंधी सर्जरी, बांझपन का मूल्यांकन तथा महिलाओं की अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का उपचार उपलब्ध कराती है।
अस्पताल में आधुनिक डायग्नोस्टिक सुविधाएं, आवश्यक जांच, व्यक्तिगत परामर्श और मरीज-केंद्रित देखभाल पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे महिलाओं को सुरक्षित, भरोसेमंद और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिल सके।
प्रसूति एवं स्त्री रोग (Obstetrics and Gynecology) महिलाओं के स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण चिकित्सा क्षेत्र है, जो किशोरावस्था से लेकर मातृत्व और रजोनिवृत्ति तक हर चरण में आवश्यक देखभाल प्रदान करता है। नियमित स्वास्थ्य जांच, गर्भावस्था के दौरान समय पर चिकित्सा परामर्श और किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करना महिलाओं के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।
यदि किसी भी प्रकार की स्त्री रोग संबंधी समस्या, गर्भधारण की योजना, गर्भावस्था की देखभाल या प्रसव से संबंधित सलाह की आवश्यकता हो, तो योग्य प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ से समय पर परामर्श लेना सबसे बेहतर कदम होता है।
यह चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जो महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य, गर्भावस्था, प्रसव और स्त्री रोगों के निदान एवं उपचार से संबंधित होती है।
गायनेकोलॉजिस्ट महिलाओं के प्रजनन अंगों और स्त्री रोगों का उपचार करते हैं, जबकि ऑब्स्टेट्रिशियन गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मां एवं शिशु की देखभाल में विशेषज्ञ होते हैं।
गर्भावस्था की पुष्टि होते ही या मासिक धर्म रुकने के बाद जितनी जल्दी संभव हो, पहली प्रसवपूर्व जांच के लिए डॉक्टर से मिलना चाहिए।
स्वस्थ महिलाओं को भी वर्ष में कम से कम एक बार गायनेकोलॉजिकल चेकअप कराना चाहिए। यदि कोई समस्या या जोखिम कारक हो, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच की आवृत्ति तय की जाती है।
ऐसी गर्भावस्था जिसमें मां, शिशु या दोनों को स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का खतरा सामान्य से अधिक हो, उसे हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी कहा जाता है।
दोनों ही सुरक्षित प्रसव के तरीके हैं। कौन-सा विकल्प बेहतर रहेगा, यह मां और शिशु की स्वास्थ्य स्थिति तथा डॉक्टर की चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करता है।
अत्यधिक रक्तस्राव, तेज पेल्विक दर्द, बार-बार संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव, भ्रूण की गतिविधियों में कमी, तेज बुखार, दुर्गंधयुक्त योनि स्राव या लंबे समय तक अनियमित मासिक धर्म होने पर तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
हाँ। चाहे कोई स्पष्ट लक्षण हों या नहीं, नियमित स्त्री रोग जांच महिलाओं के स्वास्थ्य की निगरानी, गंभीर बीमारियों की शुरुआती पहचान और समय पर उपचार के लिए आवश्यक मानी जाती है।
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